अखण्ड से पाखण्ड की ओर
आज के परिवेश मे कुछ गम्भीर प्रश्नो का उठना एक
आम बात सी हो गयी है , कि आखिर क्यो वर्तमान की राजनैतिक परिदृश्य राष्ट्र के अवाम
को कचोटती है ? क्यो समाज सेवक अब समाज के ठेकेदार बन
रहे है ? क्यो लोग धर्म और जाती के नाम पर एक दूसरे के
दुश्मन बन बैठे है ? क्यो गरीब और गरीब होते जा रहे है ? इसका मूल कारण है सत्ता का लोभ और आपसी वर्चस्व की लडाई का होना । क्योकि
जब कोई ईन्सान सत्ता से दूर होता जाता है , तो वह अपने सिधांतो से भटकने लगता है ।
वह अपने आदर्शो की अहवेलना करने लगता है । डॉक्टर राम मनोहर लोहिया जी का कथन इसकी
पुष्टी करता है कि , “ जब सिधान्त निजी स्वार्थ अथवा गिरोह
स्वार्थ की सामाग्री बन जाती है तब उनका और सच का कोई व्यापक और स्थायी रूप नही
रहता है और उसी से पाखण्ड फैलता है । ”
जो राजनेता एक शासक के रूप मे अपने को न देखकर
एक समाज सेवक के रूप मे समाज के सभी वर्गो के लोगो के विकास के लिए कार्यरत रहता
था , तथा ‘ सर्वजन
हिताय और सर्वजन सुखाय ’ के सिधांतो मे विश्वास रखता था । वह
आज सत्ता का लोभी बन बैठा है और जात - पात , धर्म और भाषा के नाम पर कुर्सी हथियाने को आतुर है । यही
लोग अब वर्तमान राजनिती का कद भी तय करने लगे है
, और राजनीति के कददावर
भी बन गये
है । सत्ता हथियाने के लिए वह समाज मे तरह
– तरह के अंधविश्वास को फैलाने मे लगा रहता है । ऐसे इन्सानो की नजरो मे व्यक्ति
की गरीमा और राष्ट्र कि एकता का कोई महत्व नही होता है । ये तो बस दिखावा करते है
कि जैसे ये लोग ही किसी खास समुदाय या खास इलाको का मसीहा हो । दरअसल ऐसा इन्सान
किसी का मसीहा नही हो सकता वह केवल कुर्सी का लोभी होता है । इस तरह के लोग
अंग्रेजो के फूट डालो और राज करो के निति का अनुसरण कर समाज को धर्म , जाती , वर्ण
और भाषा के नाम पर बाँटने का काम करते है । क्योकि समाजवाद इनके लिए बस फायदे की
चीज भर है । जिसके वजह से हमारे देश , समाज
कि अखण्डता पर हमेशा संकट के बादल मंडराते रहते है । लोभ या समाज मे फैला
अंधविश्वास किसी भी इन्सान या समुदाय के न सिर्फ तरक्की के मार्ग का सबसे बडा बाधक
है
, बल्कि बह समाज और राष्ट्र को हासिय पर ढकेलने का कार्य भी करता है
। लोभ से ही ईष्या का जन्म होता है और ईष्या ही आपसी तनाव का रूप धारण कर लेती है ।
जो कभी भी किसी भी देश या समाज या संस्कृति के लिए हितकारी नही
होता है । आपसी झगडे से किसी भी आम इन्सान
को फायदा तो नही होता है , लेकिन इसके नाम पर राजनीति करने वाले राजनेताओ के बैंक
खाते जरूर भारी होते जाते है । एक बात तो
स्पष्ट है कि अगर हम अपने देश मे धर्म , जाती और भाषा के नाम पर लडते रहेंगें तो
हमारे देश की एकता नही बच सकती है , अगर हमारे देश की एकता नही बच सकती है तो
हमारे देश की स्वतंत्रता भी ज्यादा समय तक टिक नही सकती है । क्योकि किसी भी देश
का बुनियाद एकता और अनुशासन ही होता है ।
जिस पर किसी भी देश की स्वतंत्रता टिकी हुई होती है ।
यह
तो सर्वव्यापी है की कोई भी देश उस देश मे बसने वाले तमाम समुदायो और तमाम लोगो का
देश होता है , न की किसी खास समुदाय का होता है । इसलिए अगर हमे देश मे तरक्की
लाना है या देश को विकसित बनाना है तो सबसे पहले हमे चारो ओर व्याप्त समाजिक
विडम्बना को समाप्त करना होगा , दावो और वादो के उलझन से बाहर निकलना होगा तथा बिना
भेदभाव किए हमे देश के तमाम तबके के लोगो को बिकास की मुख्य धारा से जोडना होगा ।
खासकर सभी वर्गो के महिलाओ को भी समाजिक
और आर्थिक विकास की मुख्य धारा से जोडना होगा । तभी समाज तरक्की के मार्ग पर
अग्रसर होगा । एक कहावत है कि “ जब कोई शिक्षक एक
लडके को शिक्षित करता है तो वह एक व्यक्ति को शिक्षित करता है और जब वह एक लडकी को
शिक्षित करता है तो वह पूरे परिवार को शिक्षित करता है । ”
चुकी इन्सानो से मिलकर परिवार और फिर परिवारो से मिलकर ही समाज का निर्माण होता है
, इसलिए महिलाओ की भी उपेक्षा करना कही से समाजिक उत्थान के लिए तर्क संगत प्रतित
नही होता है । क्योकि ऐसे विकसीत समाज का
कोई महत्व नही है , जो क्रोध और ईष्या का शिकार होकर अलग - अलग समुदायो , भाषाओ और
वर्णो मे विभक्त हो । यदि कोई समुदाय
समाजिक और आर्थिक तौर पर पिछडा हुआ है , तो इसमे दोष उनका नही है दोष है हमारे
समाज का जिसने अंधविश्वास मे लिप्त होकर ऊँच निच माना , दोष है इतिहास का क्योकि
हम कुछ वर्षो पहले तक गुलाम थे । अगर हम सामाजीक अंधविश्वास , भाषा , धर्म या जात पात के नाम पर लडते रहेंगे तो एक बात तो पक्का है कि देश की
अखण्डता कभी टीकने वाली नही है । बल्कि चारो ओर केवल पाखण्ड का ही राज रहेगा और
सामाजिक अधोपतन कि गति निरंतर बढती ही जाएगी । जिसके कारण लोग बदतर जिन्दगी जीने
को मजबूर होते रहेंगे ।
एकता का मतलब यह है की जितने भी लोग हो चाहे
उनके भाषा जो भी हो या फिर वो किसी भी धर्म से हो या किसी भी जाती से वह अपने आप
को पहले भारत के नागरीक समझे और समाजिक और आर्थिक तौर पर पिछडे हुए व्यक्ति को
मजबूत बनाये । समाजिक और आर्थिक तौर पर पिछडे लोगो को मजबूत बनाकर ही इस राष्ट्र
को मजबूत बनाया जा सकता है । ऐसा केवल मानवीय प्रसन्ता को बढावा देने वाली सच्ची
राजनीति से ही हो सकता है । आज के समय मे बिकास की नितियो और सोच पर स्वार्थ हावी
है । इतना तो तय है अगर हमे सभ्य समाज बनाना है तो इसका रास्ता कही न कही अच्छी
राजनीति से ही होकर गुजरती है । जयप्रकाश नारायण जी के कथनानुसार “
अगर आप सचमुच स्वतंत्रता , स्वाधीन्ता की प्रवाह करते है , तो बिना राजनीति के कोई
लोकतंत्र या उदार संस्था नही हो सकती ,
राजनीति के रोग का सही मारक और अधिक और बेहतर राजनीति ही हो सकती है , राजनीति का
अपवर्जन नही । ” इन महापुरूषो के विचारो को अहमियत देकर ही
हमे बदलते हुए समय के साथ समाज के विचारधारा मे भी बदलाव लाना होगा । इससे आम लोगो
की सोच मे बदलाव आने लगेगी तभी समाज मे अच्छे बदलाव होने लगेंगे और समाज तरक्की के
मार्ग पर अग्रसर होगा ।
विचार
· * भारत जिन मुश्किलो का
सामना कर रहा है , उसका प्रमुख कारण इसकी राष्ट्रीय पहचान की उपेक्षा
करना है – पण्डित दीन दयाल उपाध्याय
· * जब भूख और जुल्म दोनो
चीजे बढ जाती है , तो चुनाव से पहले भी सरकारे बदली जा सकती है – डॉ . राम मनोहर
लोहिया
· * याद रखिये सबसे बडा अपराध
अन्याय करना और गलत के साथ समझौता करना है – सुभाष चन्द्र बोस
· यदी जनता के अधिकारो को
कुचला गया तो आज न कल जनता संसद के अधिकारो को चुनौती देगी – कर्पूरी ठाकूर
· * सडके सुनसान हो गयी तो
संसद आवारा हो जाएगा – राम मनोहर लोहिया
· * गुलामी अत्यंत बुरा होता
है भले ही इसका नाम कितना भी खुबसुरत क्यो न हो । दिल से दी गयी शिक्षा समाज मे
क्रांति ला सकती है – मौलाना अबुल कलाम आजाद
· * जब तक आप समाजिक
स्वतंत्रता नही हासिल कर लेते , कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपक् लिए
बेमानी है – भीम राव अंबेडकर
· * शिक्षा शेरनी का दूध है
जो इसे पियेगा वह शेर की तरह दहाडेगा जरूर – डॉ भीम राव अंबेडकर
· * अज्ञान , आडम्बर , शोषण ,
भेदभाव और अन्याय से लुटती हुई मानवता को देखकर ही संत की करूणा जागती है । भगवत
प्रेम मानव प्रेम के बिना पूर्ण नही हो सकता , क्योकि भगवान का सिंहासन मानव हृदय
मे है -- संत रविदास
“ उनके साथ
चलिए जो सत्य खोज रहे है,और उनसे दूर भागिए जो ये सोचते है कि उन्होने सत्य खोज लिया है । ”
----- पुंजीवाद और कट्टरवाद आपको आधी जिन्दगी जीने पर
मजबूर कर देगी -----


Very gudu essay
ReplyDeleteKeep it up vishwajeet
ReplyDeleteKeep it up vishwajeet
ReplyDeleteKeep it up vishwajeet
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