भ्रष्टाचार उन्मूलन मे युवाओ की भूमिका
एक दिन इस तरह आ जाएगा
कि किसी
कि कोई राय न रह जाएगी
खतरा होगा
खतरे की घंटी होगी
और उसे
बादशाह बजाएगा
-
रघुवीर सहाय
लगभग 40 वर्ष पूर्व विशिष्ट कवि रघुवीर सहाय ने जब ये पंक्तियॉ लिखी थी ,
वे शक्ति की संरचना के उस आने वाले निरंकुश रूप को देख रहे थे । जिसमे ताकते इस हद
तक भ्रष्टाचार मे आकर डूबी हुई होंगी कि वे ही अपने आचरण की जाँच का स्वांग भी भर
रही होगी । वही सत्य , न्याय , ईमानदारी और नैतिकता के अर्थो को भी परिभाषित कर
रही होंगी ।
युवाओ को लेकर आम धारणा यह है कि उन्हे देश और
समाज की चिंता ही नहीं है ,और आज के युवासिर्फ
मुन्नी बदनाम हुई और शिला की जवानी जैसे गानो पर बस थिरकना जानते है । किन्तु
अस्सी के दशक मे चले जे. पी. आंदोलन हो या अन्ना के नेतृत्व मे चले भ्रष्टाचार
विरोद्धी आंदोलन इसने इस आम धारणा को गलत ठहराया है । युवाओ की हिस्सेदारी ने ही
इन आंदोलनो को एक मुकाम तक पहुँचाया है । भ्रष्टाचार अब एक सामयिक विषय है और
सामान्यतः सबका ध्यान आकृष्ठ कर रहा है । ध्यान ही आकृष्ट नही कर रहा बल्कि इसने
जनमानस को व्यापक और गहरे रूप से आंदोलित कर दिया है ।
आज हमारा समाज आमूल भ्रष्टाचार मे डूबा
है । छोटे –छोटे कार्यालयो – व्यवसायो से प्रारम्भ होकर भ्रष्टाचार ने जीवन के
प्रत्येक क्षेत्र को अपनी मुट्ठी मे कस लिया है और इसी बीच बडे भ्रष्टाचारो के
ज्वालामूखी विस्फोट ने सभी परते उधार कर रख दी । यही कारण है की कभी – कभी असंख्य लोग सरकार के नीतियो के
विरूद्ध उठ खडे हो जाते है । यह लोगो की एक बेचैनी है जो कभी – कभी आक्रोश के रूप
मे विस्फोट हो जाती है । यह समस्या इतनी विकराल है कि बडे – बडे दिग्गजो को भी कोई
समाधान दृष्टिगत नही होता । सभी अपने – अपने स्तर से इस समस्या पर तर्क – वितर्क
पर उलझे है । यह उलझन बढती ही जा रही है और अब तो कतिपय विद्धानो ने भ्रष्टाचार को
एक ‘जीवन – पद्धति ’ रूप मे स्वीकार करने का भी तर्क
प्रस्तुत कर दिया है । किन्तु समस्या के समाधान से मुँह मोड लेना कोई समाधान नहीं
। झूट को सत्य की स्वीकृति प्रदान करना एक छदम है , एक छलावा है । वीर पर्वत सी
भले हो जाए , उसे तो पिघलनी ही चाहिए ।
धीरे – धीरे देश की भ्रष्ट राजनीति ने अपना
कुरूप चेहरा प्रदर्शित करना प्रारम्भ कर दिया है । राजनीति अब दलो का दलदल हो चूकी
है । जो राजनीतिक स्वरूप हमने खडा किया है , उसमे आम लोगो की भागीदारी घोर रूप से
उपेक्षित हुई है । प्रतिनिधि अनियंत्रित होकर कार्य करने लगे है और सारी
लोकतांत्रीक व्यवस्था चिकित्सा – बिन्दु पर पहूँच गयी है । यही कारण है कि लोगो का
विश्वास इस राजनीतिक व्यवस्था से उठ चुका है तथा एक गैर राजनीतिक तथा एक गैर
सरकारी मोर्चा आम नागरिको को भा रहा है । सभी राजनीतिक आदर्श तथा सभी मूल्यो पर
उंगली उठने लगी है । जिसके परिणामस्वरूप “ राइट टू
रिकॉल ” के लिए आवाज उठने लगी है । यह राजनीतिक मूल्यो के
अधोपतन का सबसे बडा प्रमाण है ।
भारत मे राजनैतिक दल विकास एवं न्याय के मुद्दो पर संसद मे कायदे से चर्चा
भी नही करते । इसका प्रमाण इस बात से मिल सकता है कि श्री मती इन्दिरा गाँधी के
कार्यकाल मे संसद का सत्र सबसे अत्यधिक दिनो तक ( लगभग 165 दिनो तक तथा रात के 3
बजे तक ) चलने का रिकॉर्ड है । जिसके दौरान बहुत से महत्वपूर्ण बिल पास हुए थे ।
लेकिन कुछ समय से संसद का कार्यकाल इतने कम दिनो तक तथा इतने कम समय तक चलता है कि
किसी भी मुद्दे पर कायदे से चर्चा ही नही हो पाता है और इसके बावजूद यदि संसद सत्र
अगर हंगामे के भेट चढ गया तो चर्चा पर्चा मे तबदिल हो जाती है । आज कल संसद के
कार्यकाल मे बाधा उत्पन्न करना राजनीतिक दलो का एक फैशन हो चुका है । ये लोग अपने
राजनीतिक फायदे या वोट बैंक की राजनीति के लिए संसद मे हंगामा कर इसके कार्यवाही
को बाधित करते है । लोकतंत्र कि मंदिर कहे जाने वाली संसद भवन की मर्यादा को अपने
स्वार्थ के कदमो तले कुचलने का कार्य करते है । इसलिए जनता को आज की राजनीति चिढाती
है और जब उन्हे सियासत मे भ्रष्टाचार दिखता है तो यह चिढ गुस्से मे परिवर्तित हो
जाती है । जिसका परिणाम होता है तो हडताल
या फिर अनशन ।
टू –जी स्पेक्ट्रम , राष्ट्रमंडल खेलो तथा कोयला घोटालो मे मची विराट लूट
ने पूरे राष्ट्र को हिला कर रख दिया है और इसने अनैतिकता की सभी हदे पार कर दी है
। यह घोर चिन्ता का विषय है ।इस तरह हमारी लोकतांत्रिक मर्यादाएँ सिर धून रही है ।
सन 2009 ई. मे ट्रान्सपेरेन्सी इन्टरनेशनल
द्धारा कराए गए सर्वेक्षण से यह बात सामने आई थी कि भारत मे 58 प्रतिशत लोगो का
विश्वास अपने राजनीतिक नेताओ से उठ चुका है । लेकिन इसके बावजूद युवा सांसदो तथा
कुछ वैसे सांसद जो देश के प्रति समर्पण का भावना रखते है उनके बदौलत ही संसद की
मर्यादाए धूमिल होने से बच जाती है । वर्तमान मे कुछ युवा सांसदो ( रामेश्वर तेली –
डिब्रुगढ . असम बी.जे.पी. , संतोष कुमार –
पूर्णिया . बिहार जे.डी.यू. , राम मोहन नायडू – आंध्रप्रदेश तेलगू देशम , राजेश कुमार उर्फ भूलो मंडल –
भागलपूर . बिहार आर.जे.डी.) के अलावा अरूण
जेटली , हुकुम देव नारायण यादव , शरद यादव जैसे कुछ नेता है जो केवल सांसद ही नही
बल्कि संसद भवन की मर्यादा को दागदार होने से बचाते है ।
इस सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में आज युवाओ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई
। जब – जब संकट उपस्थित होता है , युवा ही संरक्षक और उद्धारक बनकर उभरते है ।
चाहे स्वाधिनता आंदोलन हो या छात्र आंदोलन हर समय युवाओ ने ही संघर्ष का नया
इतिहास रचा और देश को संकटो से ऊबारा । इसलिए आज देश की युवा शक्ति को अपनी ढृढ
इच्छा शक्ति जाग्रत करने की आवश्यकता है क्योकि आखिर भविष्य उसी का है । धूमिल की
निम्नलिखित पंक्तियाँ उस ‘ तीसरे ’ की पहचान की अपेक्षा करती हैं –
“ एक आदमी
रोटी बेलता है ,
एक आदमी रोटी खाता है ,
एक
तीसरा आदमी भी है जो,
न रोटी बेलता है , न रोटी खाता है ,
वह
रोटी से खेलता है। ”
n विश्वजीत गुप्ता



