Thursday, 16 February 2017

भ्रष्टाचार उन्मूलन मे युवाओ की भूमिका

                                      एक दिन इस तरह आ जाएगा
                                      कि किसी कि कोई राय न रह जाएगी     
                                     खतरा होगा खतरे की घंटी होगी
                                      और उसे बादशाह बजाएगा
-          रघुवीर सहाय
                                                                   लगभग 40 वर्ष पूर्व विशिष्ट कवि रघुवीर सहाय ने जब ये पंक्तियॉ लिखी थी , वे शक्ति की संरचना के उस आने वाले निरंकुश रूप को देख रहे थे । जिसमे ताकते इस हद तक भ्रष्टाचार मे आकर डूबी हुई होंगी कि वे ही अपने आचरण की जाँच का स्वांग भी भर रही होगी । वही सत्य , न्याय , ईमानदारी और नैतिकता के अर्थो को भी परिभाषित कर रही होंगी ।
                                                                       युवाओ को लेकर आम धारणा यह है कि उन्हे देश और समाज की चिंता  ही नहीं है ,और आज के युवासिर्फ मुन्नी बदनाम हुई और शिला की जवानी जैसे गानो पर बस थिरकना जानते है । किन्तु अस्सी के दशक मे चले जे. पी. आंदोलन हो या अन्ना के नेतृत्व मे चले भ्रष्टाचार विरोद्धी आंदोलन इसने इस आम धारणा को गलत ठहराया है । युवाओ की हिस्सेदारी ने ही इन आंदोलनो को एक मुकाम तक पहुँचाया है । भ्रष्टाचार अब एक सामयिक विषय है और सामान्यतः सबका ध्यान आकृष्ठ कर रहा है । ध्यान ही आकृष्ट नही कर रहा बल्कि इसने जनमानस को व्यापक और गहरे रूप से आंदोलित कर दिया है ।
                                                                    आज हमारा समाज आमूल भ्रष्टाचार मे डूबा है । छोटे –छोटे कार्यालयो – व्यवसायो से प्रारम्भ होकर भ्रष्टाचार ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को अपनी मुट्ठी मे कस लिया है और इसी बीच बडे भ्रष्टाचारो के ज्वालामूखी विस्फोट ने सभी परते उधार कर रख दी । यही कारण  है की कभी – कभी असंख्य लोग सरकार के नीतियो के विरूद्ध उठ खडे हो जाते है । यह लोगो की एक बेचैनी है जो कभी – कभी आक्रोश के रूप मे विस्फोट हो जाती है । यह समस्या इतनी विकराल है कि बडे – बडे दिग्गजो को भी कोई समाधान दृष्टिगत नही होता । सभी अपने – अपने स्तर से इस समस्या पर तर्क – वितर्क पर उलझे है । यह उलझन बढती ही जा रही है और अब तो कतिपय विद्धानो ने भ्रष्टाचार को एक जीवन – पद्धतिरूप मे स्वीकार करने का भी तर्क प्रस्तुत कर दिया है । किन्तु समस्या के समाधान से मुँह मोड लेना कोई समाधान नहीं । झूट को सत्य की स्वीकृति प्रदान करना एक छदम है , एक छलावा है । वीर पर्वत सी भले हो जाए , उसे तो पिघलनी ही चाहिए ।
                                                             धीरे – धीरे देश की भ्रष्ट राजनीति ने अपना कुरूप चेहरा प्रदर्शित करना प्रारम्भ कर दिया है । राजनीति अब दलो का दलदल हो चूकी है । जो राजनीतिक स्वरूप हमने खडा किया है , उसमे आम लोगो की भागीदारी घोर रूप से उपेक्षित हुई है । प्रतिनिधि अनियंत्रित होकर कार्य करने लगे है और सारी लोकतांत्रीक व्यवस्था चिकित्सा – बिन्दु पर पहूँच गयी है । यही कारण है कि लोगो का विश्वास इस राजनीतिक व्यवस्था से उठ चुका है तथा एक गैर राजनीतिक तथा एक गैर सरकारी मोर्चा आम नागरिको को भा रहा है । सभी राजनीतिक आदर्श तथा सभी मूल्यो पर उंगली उठने लगी है । जिसके परिणामस्वरूप राइट टू रिकॉलके लिए आवाज उठने लगी है । यह राजनीतिक मूल्यो के अधोपतन का सबसे बडा प्रमाण है ।
                                                                 भारत मे राजनैतिक दल विकास एवं न्याय के मुद्दो पर संसद मे कायदे से चर्चा भी नही करते । इसका प्रमाण इस बात से मिल सकता है कि श्री मती इन्दिरा गाँधी के कार्यकाल मे संसद का सत्र सबसे अत्यधिक दिनो तक ( लगभग 165 दिनो तक तथा रात के 3 बजे तक ) चलने का रिकॉर्ड है । जिसके दौरान बहुत से महत्वपूर्ण बिल पास हुए थे । लेकिन कुछ समय से संसद का कार्यकाल इतने कम दिनो तक तथा इतने कम समय तक चलता है कि किसी भी मुद्दे पर कायदे से चर्चा ही नही हो पाता है और इसके बावजूद यदि संसद सत्र अगर हंगामे के भेट चढ गया तो चर्चा पर्चा मे तबदिल हो जाती है । आज कल संसद के कार्यकाल मे बाधा उत्पन्न करना राजनीतिक दलो का एक फैशन हो चुका है । ये लोग अपने राजनीतिक फायदे या वोट बैंक की राजनीति के लिए संसद मे हंगामा कर इसके कार्यवाही को बाधित करते है । लोकतंत्र कि मंदिर कहे जाने वाली संसद भवन की मर्यादा को अपने स्वार्थ के कदमो तले कुचलने का कार्य करते है । इसलिए जनता को आज की राजनीति चिढाती है और जब उन्हे सियासत मे भ्रष्टाचार दिखता है तो यह चिढ गुस्से मे परिवर्तित हो जाती है । जिसका परिणाम होता है तो  हडताल या फिर अनशन ।
                                                                   टू –जी स्पेक्ट्रम , राष्ट्रमंडल खेलो तथा कोयला घोटालो मे मची विराट लूट ने पूरे राष्ट्र को हिला कर रख दिया है और इसने अनैतिकता की सभी हदे पार कर दी है । यह घोर चिन्ता का विषय है ।इस तरह हमारी लोकतांत्रिक मर्यादाएँ सिर धून रही है । सन 2009 ई. मे  ट्रान्सपेरेन्सी इन्टरनेशनल द्धारा कराए गए सर्वेक्षण से यह बात सामने आई थी कि भारत मे 58 प्रतिशत लोगो का विश्वास अपने राजनीतिक नेताओ से उठ चुका है । लेकिन इसके बावजूद युवा सांसदो तथा कुछ वैसे सांसद जो देश के प्रति समर्पण का भावना रखते है उनके बदौलत ही संसद की मर्यादाए धूमिल होने से बच जाती है । वर्तमान मे कुछ युवा सांसदो ( रामेश्वर तेली – डिब्रुगढ . असम  बी.जे.पी. , संतोष कुमार – पूर्णिया . बिहार  जे.डी.यू.  , राम मोहन नायडू – आंध्रप्रदेश  तेलगू देशम , राजेश कुमार उर्फ भूलो मंडल – भागलपूर . बिहार  आर.जे.डी.) के अलावा अरूण जेटली , हुकुम देव नारायण यादव , शरद यादव जैसे कुछ नेता है जो केवल सांसद ही नही बल्कि संसद भवन की मर्यादा को दागदार होने से बचाते है ।
                                                                 इस सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य में आज युवाओ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई । जब – जब संकट उपस्थित होता है , युवा ही संरक्षक और उद्धारक बनकर उभरते है । चाहे स्वाधिनता आंदोलन हो या छात्र आंदोलन हर समय युवाओ ने ही संघर्ष का नया इतिहास रचा और देश को संकटो से ऊबारा । इसलिए आज देश की युवा शक्ति को अपनी ढृढ इच्छा शक्ति जाग्रत करने की आवश्यकता है क्योकि आखिर भविष्य उसी का है । धूमिल की निम्नलिखित पंक्तियाँ उस तीसरे की पहचान की अपेक्षा करती हैं –
एक आदमी रोटी बेलता है ,
   एक आदमी रोटी खाता है ,
   एक तीसरा आदमी भी है जो,
   न रोटी बेलता है , न रोटी खाता है ,
   वह रोटी से खेलता है।

n  विश्वजीत  गुप्ता

Tuesday, 14 February 2017



                                अखण्ड से पाखण्ड की ओर

                                                                         आज के परिवेश मे कुछ गम्भीर प्रश्नो का उठना एक आम बात सी हो गयी है , कि आखिर क्यो वर्तमान की राजनैतिक परिदृश्य राष्ट्र के अवाम को कचोटती है ? क्यो समाज सेवक अब समाज के ठेकेदार बन रहे है ? क्यो लोग धर्म और जाती के नाम पर एक दूसरे के दुश्मन बन बैठे है ? क्यो गरीब और गरीब होते जा रहे है ? इसका मूल कारण है सत्ता का लोभ और आपसी वर्चस्व की लडाई का होना । क्योकि जब कोई ईन्सान सत्ता से दूर होता जाता है , तो वह अपने सिधांतो से भटकने लगता है । वह अपने आदर्शो की अहवेलना करने लगता है । डॉक्टर राम मनोहर लोहिया जी का कथन इसकी पुष्टी करता है कि , “ जब सिधान्त निजी स्वार्थ अथवा गिरोह स्वार्थ की सामाग्री बन जाती है तब उनका और सच का कोई व्यापक और स्थायी रूप नही रहता है और उसी से पाखण्ड फैलता है ।
                                                                        जो राजनेता एक शासक के रूप मे अपने को न देखकर एक समाज सेवक के रूप मे समाज के सभी वर्गो के लोगो के विकास के लिए कार्यरत रहता था , तथा सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय के सिधांतो मे विश्वास रखता था । वह आज सत्ता का लोभी बन बैठा है और जात - पात , धर्म और भाषा  के नाम पर कुर्सी हथियाने को आतुर है । यही लोग अब वर्तमान राजनिती का कद भी तय  करने  लगे  है , और  राजनीति  के  कददावर  भी  बन  गये है । सत्ता हथियाने के लिए वह  समाज  मे  तरह – तरह के अंधविश्वास को फैलाने मे लगा रहता है । ऐसे इन्सानो की नजरो मे व्यक्ति की गरीमा और राष्ट्र कि एकता का कोई महत्व नही होता है । ये तो बस दिखावा करते है कि जैसे ये लोग ही किसी खास समुदाय या खास इलाको का मसीहा हो । दरअसल ऐसा इन्सान किसी का मसीहा नही हो सकता वह केवल कुर्सी का लोभी होता है । इस तरह के लोग अंग्रेजो के फूट डालो और राज करो के निति का अनुसरण कर समाज को धर्म , जाती , वर्ण और भाषा के नाम पर बाँटने का काम करते है । क्योकि समाजवाद इनके लिए बस फायदे की चीज भर है ।  जिसके वजह से हमारे देश , समाज कि अखण्डता पर हमेशा संकट के बादल मंडराते रहते है । लोभ या समाज मे फैला अंधविश्वास किसी भी इन्सान या समुदाय के न सिर्फ तरक्की के मार्ग का सबसे बडा बाधक है , बल्कि बह समाज और राष्ट्र को हासिय पर ढकेलने का कार्य भी करता है । लोभ से ही ईष्या का जन्म होता है और ईष्या ही आपसी तनाव का रूप धारण कर लेती है । जो कभी भी  किसी भी  देश या समाज या संस्कृति के लिए हितकारी नही होता है । आपसी झगडे से  किसी भी आम इन्सान को फायदा तो नही होता है , लेकिन इसके नाम पर राजनीति करने वाले राजनेताओ के बैंक खाते जरूर भारी होते जाते है  । एक बात तो स्पष्ट है कि अगर हम अपने देश मे धर्म , जाती और भाषा के नाम पर लडते रहेंगें तो हमारे देश की एकता नही बच सकती है , अगर हमारे देश की एकता नही बच सकती है तो हमारे देश की स्वतंत्रता भी ज्यादा समय तक टिक नही सकती है । क्योकि किसी भी देश का  बुनियाद एकता और अनुशासन ही होता है । जिस पर किसी भी देश की स्वतंत्रता टिकी हुई होती है ।
                                                                            यह तो सर्वव्यापी है की कोई भी देश उस देश मे बसने वाले तमाम समुदायो और तमाम लोगो का देश होता है , न की किसी खास समुदाय का होता है । इसलिए अगर हमे देश मे तरक्की लाना है या देश को विकसित बनाना है तो सबसे पहले हमे चारो ओर व्याप्त समाजिक विडम्बना को समाप्त करना होगा , दावो और वादो के उलझन से बाहर निकलना होगा तथा बिना भेदभाव किए हमे देश के तमाम तबके के लोगो को बिकास की मुख्य धारा से जोडना होगा । खासकर  सभी वर्गो के महिलाओ को भी समाजिक और आर्थिक विकास की मुख्य धारा से जोडना होगा । तभी समाज तरक्की के मार्ग पर अग्रसर होगा । एक कहावत है कि जब कोई शिक्षक एक लडके को शिक्षित करता है तो वह एक व्यक्ति को शिक्षित करता है और जब वह एक लडकी को शिक्षित करता है तो वह पूरे परिवार को शिक्षित करता है । चुकी इन्सानो से मिलकर परिवार और फिर परिवारो से मिलकर ही समाज का निर्माण होता है , इसलिए महिलाओ की भी उपेक्षा करना कही से समाजिक उत्थान के लिए तर्क संगत प्रतित नही होता है । क्योकि ऐसे विकसीत  समाज का कोई महत्व नही है , जो क्रोध और ईष्या का शिकार होकर अलग - अलग समुदायो , भाषाओ और वर्णो मे विभक्त हो ।  यदि कोई समुदाय समाजिक और आर्थिक तौर पर पिछडा हुआ है , तो इसमे दोष उनका नही है दोष है हमारे समाज का जिसने अंधविश्वास मे लिप्त होकर ऊँच निच माना , दोष है इतिहास का क्योकि हम कुछ वर्षो पहले तक गुलाम थे । अगर हम सामाजीक अंधविश्वास  , भाषा , धर्म या जात पात के नाम पर लडते रहेंगे तो एक बात तो पक्का है कि देश की अखण्डता कभी टीकने वाली नही है । बल्कि चारो ओर केवल पाखण्ड का ही राज रहेगा और सामाजिक अधोपतन कि गति निरंतर बढती ही जाएगी । जिसके कारण लोग बदतर जिन्दगी जीने को मजबूर होते रहेंगे ।
                                                                           एकता का मतलब यह है की जितने भी लोग हो चाहे उनके भाषा जो भी हो या फिर वो किसी भी धर्म से हो या किसी भी जाती से वह अपने आप को पहले भारत के नागरीक समझे और समाजिक और आर्थिक तौर पर पिछडे हुए व्यक्ति को मजबूत बनाये । समाजिक और आर्थिक तौर पर पिछडे लोगो को मजबूत बनाकर ही इस राष्ट्र को मजबूत बनाया जा सकता है । ऐसा केवल मानवीय प्रसन्ता को बढावा देने वाली सच्ची राजनीति से ही हो सकता है । आज के समय मे बिकास की नितियो और सोच पर स्वार्थ हावी है । इतना तो तय है अगर हमे सभ्य समाज बनाना है तो इसका रास्ता कही न कही अच्छी राजनीति से ही होकर गुजरती है । जयप्रकाश नारायण जी के कथनानुसार अगर आप सचमुच स्वतंत्रता , स्वाधीन्ता  की प्रवाह करते है , तो बिना राजनीति के कोई लोकतंत्र या उदार संस्था नही हो सकती  , राजनीति के रोग का सही मारक और अधिक और बेहतर राजनीति ही हो सकती है , राजनीति का अपवर्जन नही ।इन महापुरूषो के विचारो को अहमियत देकर ही हमे बदलते हुए समय के साथ समाज के विचारधारा मे भी बदलाव लाना होगा । इससे आम लोगो की सोच मे बदलाव आने लगेगी तभी समाज मे अच्छे बदलाव होने लगेंगे और समाज तरक्की के मार्ग पर अग्रसर होगा  ।

                विचार                    
·     *   भारत जिन मुश्किलो का सामना कर रहा है , उसका प्रमुख कारण इसकी राष्ट्रीय पहचान की   उपेक्षा करना     है – पण्डित दीन दयाल उपाध्याय
·    *    जब भूख और जुल्म दोनो चीजे बढ जाती है , तो चुनाव से पहले भी सरकारे बदली जा सकती है – डॉ . राम           मनोहर लोहिया
·    *    याद रखिये सबसे बडा अपराध अन्याय करना और गलत के साथ समझौता करना है – सुभाष   चन्द्र बोस
·        यदी जनता के अधिकारो को कुचला गया तो आज न कल जनता संसद के अधिकारो को चुनौती देगी – कर्पूरी   ठाकूर
·    *    सडके सुनसान हो गयी तो संसद आवारा हो जाएगा – राम मनोहर लोहिया
·    *   गुलामी अत्यंत बुरा होता है भले ही इसका नाम कितना भी खुबसुरत क्यो न हो । दिल से दी गयी शिक्षा समाज  मे क्रांति ला सकती है – मौलाना अबुल कलाम आजाद
·   *     जब तक आप समाजिक स्वतंत्रता नही हासिल कर लेते , कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपक्         लिए बेमानी है – भीम राव अंबेडकर
·    *    शिक्षा शेरनी का दूध है जो इसे पियेगा वह शेर की तरह दहाडेगा जरूर – डॉ भीम राव अंबेडकर
·   *   अज्ञान , आडम्बर , शोषण , भेदभाव और अन्याय से लुटती हुई मानवता को देखकर ही संत की करूणा जागती   है । भगवत प्रेम मानव प्रेम के बिना पूर्ण नही हो सकता , क्योकि भगवान का सिंहासन मानव हृदय मे है --          संत रविदास                                                                                                    


     उनके साथ चलिए जो सत्य खोज रहे है,और उनसे दूर भागिए जो ये सोचते है कि उन्होने सत्य खोज लिया है ।

                    -----  पुंजीवाद और कट्टरवाद आपको आधी जिन्दगी जीने पर मजबूर कर देगी  -----


                                                                      -विश्वजीत गुप्ता

                                 परिश्रम ही फलदायी है

                                                   ये कदम नही प्रहार है,
                                                   हर दर्द पर आघात है,
                                                   जो चोट मैने खायी थी,
                                                   जो दर्द मैने झेला है,
                                                   उस दर्द ने ली अब अंगराई है,
                                                   उस दर्द की घटी परछाई है,
                                                   अभाव प्रभाव के रूप मे ऊभर आयी है,
                                                   जिसने बेर्ददी का अंघेरा का दूर भगायी है,
                                                   इस संघर्ष से नया सबेरा आयी है,
                                                   मदमस्त पवन लहराई है,
                                                   खुशीयो की बादल छायी है,
                                                   मुस्कुराहट की बूँदे छलकायी है,
                                                   अंकूर फुट बाहर आयी है,
                                                   धरती पर हरियाली लहलहायी है,
                                                   क्योकि परिश्रम ही फलदायी है,
                                                   बस परिश्रम ही फलदायी है ।